Historians tell Know your History-18

Saturday, April 29, 2017

Historians tell
Know your History-18
एलेग्जेंडर से मुकाबला करने वाली कौमों में मल्ल या मल्लोई (मेघ) लोगों का जिक्र एलेग्जेंडर के इतिहासकारों ने किया है। जिसका पहले जिक्र किया जा चूका है। मेघ लोग उसी जातीय समूह से थे। यह भी बताया जा चूका है। ओस्टियाक लोगों के साथ इनका वर्णन एशिया के इतिहास में मिलता है। मेघ लोग सिन्धु तट पर रहने वाले इन्ही मल्ल लोगों में बताये गए। सिंध से उनका विस्थापन होने पर वे सिंध के ही गुजरात और राजस्थान के थल में आ गए। विभिन्न समय पर विभिन्न समूहों में आये।
वर्तमान बाड़मेर में उनका आगमन सिकंदर के समय से मिलता है। बाद में कासिम के समय फिर बड़ा आव्रिजन हुआ। उसके बाद भी होता रहा। मल्ल लोगों के आधिपत्य के कारण इस क्षेत्र का नाम मालानी पड़ा अर्थात मल्ल लोगों का क्षेत्र। बाद में सलखा के पुत्र ने अधिपत्य बनाया पर क्षेत्र का नाम वही रहा। मल्लों (मेघों) में से अलग होकर कुछ लोग राजपूत घेरे में गए। कर्नल टॉड के विचार में राठौर और चौहान राजपूत इन्ही मल्लों से निकले। मुलतान का नाम मल्ल लोगों के कारण पड़ा। मल्ल लोगों को बहुवचन में मल्ली या मल्लोई भी कहा जाता था। पिलनी के mech या mekoi मल्ल कहे गए। भाषा और बोली में वर्णों के उच्चारण में ch क में और क ज में, ज पुनः ग व घ में बदलता है। यूनानी/ अरबी / पालि /संस्कृत के लब्ज और लिखावट को समझिये।
सत्य जो भी हो, कर्नल टॉड की कृति "अनाल्स एंड एंटिक्विटी ऑफ़ राजस्थान" के तीसरे वॉल्यूम की कुछ टिप्पणियाँ नीचे दी जा रही है, जो विचारणीय है-
Barmer or Mallani- "--whole of this region was formerly inhabitated by a tribe called malli, or mallani,who, although asserted by some to be rathore in origion, are assuredly chauhan, and of the same stock as the ancient lords of Juna Chhotan.-----" page-1272 .
"Sonagir, the ' golden maintenance' is the more ancient castle, and was adopted by chauhans as distinctive of their tribe when the older term, mallani was dropped for sonigira. Here they enshrined their tutelary divinity, mallinath, 'God of mallis,' -----when the name of sonigir was exchanged for that of jalor, -----divinity of Jalandharnath was imported from Ganges or left as well as the God of the malli by the ci- devant mallanis, is uncertain. BUT prove to be remnant of foes of Alexander, driven by him from Multan.----"page- 1266.
At footnote on page- 1266, he speaks- "Multan and Juna ( chhotan...) have the same significance, the ancient abode and both were occupied by the tribe of malli or mallanis, said to be -----"
Also at page 1279 he writes- "we must describe the descendants of the Malli, foe of Alexander, or of the no less heroic Prithviraj, as a community of thieves, who used to carry their raids into Sindh, Gujarat and Jared, to arrange themselves on private property----" and so on.
Refefence: James Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan or the central and western Rajput states of India," Volume-3, book- 1, Oxford university press, London, 1920.
Know your history-19
यहाँ नीचे Alexander Cunningham द्वारा मेघो के इतिहास के बारे में और उनकी ethnology के बारे में
"Archaeological Survey of India: four reports during the years 1862-63-64-65, volume-2
के पेज संख्या 11 से 13 का विवरण ज्यों का त्यों दे रहा हूँ। यह रिपोर्ट गवर्नमेंट सेंट्रल प्रेस, शिमला से 1871 में प्रकाशित हुई थी।
Sir Alexander Cunningham (23 January 1814 – 28 November 1893)
"Connected with the Takkas by a similar inferiority of social position is the tribe of Megs, who form a large part of the population of Riyasi, Jammu, and Aknur. According to the annals of the Jammu Rajas, the ancestors of Gulab Singh were two Rajput brothers, who, after the defeat of Prithi Raj, settled on the bank of the Tohi or Tohvi River amongst the poor race of cultivators called Megs. Mr. Gardner calls them "a poor race of low caste," but more numerous than the Takkas.t In another place he ranges them amongst the lowest class of outcasts ; but this is quite contrary to my information, and is besides inconsistent with his own description of them as "cultivators." They are but little inferior, if not equal, to Takkas. I have failed in tracing their name in the middle ages, but I believe that we safely identify them with the Mekei of Aryan, who inhabited the banks of the River Saranges near its confluence with the Hydraotes.J This river has not yet been identified with certainty, but as it is mentioned immediately after the Hyphasis or Bias, it should be the same as the Satlaj. In Sauskrit the Satlaj is called Satadru, or the " hundred channeled," a name which is fairly represented by Ptolemy's Zaradrus, and also by Pliny's Hesidrus, as the Sanskrit Sata becomes Hata in many of the W. Dialects. In its upper course the commonest name is Satrudr or Satudr, a spoken form of Satudra, which is only a corruption of the Sanskrit Satadru. By many Brahmans, how ever, Satudra is considered to be the proper name, although from the meaning which they give to it of "hundred- bellied," the correct form would be Satodra. Now Arrian's Saranges is evidently connected with these various readings, as Satdnga means the '* hundred divisions," or " hundred parts," in allusion to the numerous channels which the Satlaj takes just as it leaves the hills. According to this identification the Mekei, or ancient Megs, must have inhabited the banks of the Satlaj at the time of Alexander's invasion. In confirmation of this position, I can cite the name of Megarsus, which Dionysius Periegetes gives to the Satlaj, along with the epithets of great and rapid.* This name is changed to Cymander by Aoienus, but as Priscian preserves it unaltered, it seems probable that we ought to read Mycander, which would assimilate it with the original name of Dionysius. But whatever may be the true reading of Avienus, it is most probable that we have the name of the Meg tribe preserved in the Megarsus River of Dionysius. On comparing the two names together, I think it possible that the original reading may have been Megandros, which would be equivalent to the Sanskrit Megadru, or river of the Megs. Now in this very part of the Satlaj, where the river leaves the hills, we find the important town of Makhowdl, the town of the Makh or Magh tribe, an inferior class of cultivators, who claim descent from Raja Mukh- tesar, a Sarsuti Brahman and King of Mecca ! " From him sprang Sahariya, who with his son Sal was turned out of Arabia, and migrated to the Island of Pundri; eventually they reached Mahmudsar, in Barara, to the west of Bhatinda, where they colonised seventeen villages. Thence they were driven forth, and, after sundry migrations, are now settled in the districts of Patiala, Shahabad, Thanesar, Ambala, Mustafabad, Sadhaora, and Muzafarnagar."* From this account we learn that the earliest location of the Maghs was to the westward of Bhatinda, that is, on the banks of the Satlaj. At what period they were driven from this locality they know not ; but if, as seems highly probable, the Magiaus whom Timur encountered on the banks of the Jumna and Ganges were only Maghs, their ejectment from the banks of the Satlaj must have occurred at a comparatively early period. The Megs of the Chenab have a tradition that they were driven from the plains by the early Muhammadans, a statement which we may refer either to the first inroads of Mahmud, in the beginning of the eleventh century, or to the final occupation of Lahor by his immediate successors. 3. Other
* Orljis DcsLTi1itio, V. 1145.
• Smith's Rcv1ning Family of Lahor, p. 232, and Appendix p. xxix. In the text he m.'iti* the " Tukkers" Hindus, but in the Appendix he calls the " Tuk" a " brahman caste." The two names are, however, most probably not the same. t Ibid, pp. 232, 201, and Appendix p. Xxix."
जनरल कनिंघम के अंग्रेजी विवरण का श्री भारत भूषण भगत जी द्वारा किया गया मुक्तहस्त हिंदी अनुवाद...
कहते हैं कि इतिहास, इतिहासकार और कथाकार हमेशा रहते हैं. इस बीच राजस्थान से मेघवंश के इतिहासकार श्री ताराराम ने "मेघवंश : इतिहास और संस्कृति" नामक पुस्तक लिखी जो मेरी दृष्टि से मेघों का एक प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करती है. उनसे एक दिन फोन पर बात करते हुए मैंने पूछा कि क्या जम्मू के पास झेलम, सतलुज के बीच के क्षेत्र में मेघों का सिकंदर से कोई सामना नहीं हुआ? उन्होंने कहा कि सर एलैग्ज़ांडर कन्निंघम ने ऐसे संकेत दिए हैं. मैंने बहुत कोशिश की लेकिन मुझे कन्निंघम की पुस्तक नहीं मिली. कर्नल तिलक राज (Col. Tilak Raj) और श्री आर.एल. गोत्रा (R.L. Gottra) जी से भी बात हुई. इतना मालूम पड़ा कि लॉर्ड कन्निंघम की पुस्तक में मेघों का उल्लेख है.
कुछ दिन पूर्व ताराराम जी ने कन्निंघम की पुस्तक का वह अंश फेसबुक पर शेयर किया और मुझे भी अग्रेषित कर दिया. एक लिंक भी भेजा. पहली बार मुझे वे अंश पढ़ने को मिले और मैं अपनी खुशी को रोक नहीं पाया. सबसे पहले मैंने उसे www.meghnet.com पर बनाए पृष्ठ Historians Tell-2 पर शामिल किया और अलग से एक ब्लॉग लिखने की तैयारी शुरू कर दी. मेरी कल्पना के घोड़े बहुत जंगली हैं और जब वे हिनहिनाते हैं तो मैं दौड़ने लगता हूँ. घोड़ों पर मेरा वश नहीं लेकिन दौड़ने पर है.
कन्निंघम ने जो लिखा है वह ज़रा पुरानी अंग्रेज़ी में लिखा है और उस विद्वान ने ग्रीक और अन्य भाषाओं के ऐसे कई शब्द भी प्रयोग किए हैं जिन्हें सही प्रतिनिधि ध्वनि के साथ देवनागरी में लिखना मेरे लिए कठिन था इसलिए उनके आगे (कोष्ठकों में) उनकी अंग्रेज़ी वर्तनी (spellings) दे दी है. कन्निंघम ने क्या कहा है उसका लगभग एक स्वतंत्र अनुवाद नीचे दिया है.
सामाजिक स्थिति में समान कमतरी ( similar inferiority) वाले टकों (Takkas) से जुड़ा एक कबीला मेघों का है जो रियासी, जम्मू और अख़नूर की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है. जम्मू के राजाओं के अभिलेखों और रिकार्ड (annals) के अनुसार गुलाब सिंह के पूर्वज दो राजपूत भाई थे जो पृथ्वीराज की पराजय के बाद टोही या टोहवी नदी (Tohi or Tohvi river) के किनारे मेघ कहलाने वाले गरीब काश्तकार (cultivators) वंश में बस गए. मिस्टर गार्डनर ने उन्हें निम्न जाति का निर्धन वंश कहा है, लेकिन वे टकों के मुकाबले संख्या में अधिक हैं. एक अन्य जगह वे उन्हें बहिष्कृतों की निम्नतम जमात में रखते हैं; लेकिन यह मेरी सूचना के विपरीत है, इसके अलावा यह उसके उस वर्णन से भी मेल नहीं खाता जिसमें उसने उन्हें "काश्तकार" कहा है. यदि वे टकों के समान नहीं हैं तो उनसे बहुत कमतर (inferior) भी नहीं हैं. मैं उनका मध्ययुगीन नाम ढूँढने में असफल रहा हूँ, लेकिन मुझे यकीन है कि हम विश्वसनीय रूप से उन्हें आर्यों के मेकी (Mekei) के तौर पर पहचान सकते हैं, जो सारंगीज़ (Saranges) नदी के किनारे उसके हाइड्राओटीज़ (Hydraotes) के संगम के पास रहते थे. इस नदी की अभी पक्की पहचान नहीं हुई है, लेकिन क्योंकि इसका उल्लेख हाइफेसिस (Hyphasis) या ब्यास के तुरत बाद में हुआ है, इसे सतलुज होना चाहिए. संस्कृत में सतलुज को शतद्रु (Satadru), या "शतधारा)" (hundred channeled) वाली, कहा गया है. यह ऐसा नाम है जो टोलेमी के ज़राड्रस (Ptolemy's Zaradrus) और प्लिनी के हेज़ीड्रस (Pliny's Hesidrus) को ठीक-ठाक तरीके से दर्शाता है क्योंकि संस्कृत का 'शत' कई पश्चिमी बोलियों में 'हत' बन जाता है. इसके ऊपरी मार्ग में इसका नाम शत्रुद्र या शतुद्र (Satrudr or Satudr) है जो संस्कृत के 'शतद्रु' का ही बिगड़ा हुआ और सामान्यतः बोला जाने वाला रूप है. तथापि कई ब्राह्मण शतुद्र को सही मानते हैं यद्यपि वे इसे "सौ उदर" (पेट) (hundred-bellied) वाले अर्थ से जानते हैं, तब इसका नाम 'शतोदर' होना चाहिए था. अब एर्रियन का सारंगीज़ (Arrian's Saranges) प्रत्यक्षतः इन विभिन्न शब्दों के साथ जुड़ा है जैसे शतांग (hundred divisions), शतांग (hundred parts) जिसका अर्थ है सौ विभाजन या सौ अंग, जो सतलुज के पर्वतीय क्षेत्र छोड़ने के बाद कई धाराओं में बँटने का संकेत देता है. इस पहचान के अनुसार मेकी, या प्राचीन मेघ, सिकंदर के आक्रमण के समय ज़रूर सतलुज के किनारों पर बस चुके थे. इस स्थिति की पुष्टि में, मैं मेगारसस (Megarsus) का नाम ले सकता हूँ एक नाम जो डियोनाइसिअस पेरीगिटीज़ (Dionysius Periegetes) ने सतलुज को महान और तीव्र के विशेषणों के साथ दिया था.* ऑइनस (Aoienus) ने नाम को बदल कर सिमेंडर (Cymander) कर दिया, लेकिन क्योंकि प्रिसियन (Priscian) ने बिना बदलाव के इसे सुरक्षित रखा, इससे लगता है कि हमें माइकेंडर (Mycander) को पढ़ना चाहिए, जिसने इसे मूल नाम डियोनाइसियस (Dionysius) के साथ समावेशित किया. अवीनस (Avienus) ने जो भी लिखा हो, इसकी संभावना सबसे अधिक है कि हमारे पास मेघ कबीले का नाम डियोनाइसियस (Dionysius) के मेगारसस (Megarsus) नदी में सुरक्षित है. दोनों नामों की आपस में तुलना करने पर, मेरे अनुसार संभव है कि मूल शब्द मेगान्ड्रोस (Megandros) हो जो संस्कृत के शब्द मेगाद्रु, या मेघों का दरिया, के समतुल्य होगा. अब सतलुज के इसी भाग में, जहाँ यह दरिया पर्वतों से बाहर आता है, हम मखोवाल (Makhowal) शहर पाते हैं, मख या मेघ कबीले (Makh or Magh tribe) का शहर, कमतर स्थिति वाले किसानों की जमात, जो खुद को राजा मुख-तेसर (Mukh-tesar), एक सरसुती ब्राह्मण और मक्का का राजा (Sarsuti Brahman and King of Mecca), का परवर्ती मानते हैं. उसी से सहारिया (Sahariya) निकला, जिसे अपने बेटे साल (Sal) के साथ अरब (Arabia) से निकाल दिया गया था और वह पुंड्री द्वीप (Island of Pundri) में आ गए थे; अंततः वे बरारा, जो भठिंडा के पश्चिम में है, में महमूदसर में आए और वहाँ सत्रह गाँव बसा लिए. उसके बाद वे और आगे आए और छुटपुट आव्रजन (immigraion) के बाद अब वे पटियाला, शाहबाद, थानेसर, मुस्तफाबाद, सधौरा और मुज़फ़्फ़रनगर में बस गए हैं.* इस वर्णन से हमें ज्ञात होता है कि मेघों की पूर्वतम स्थिति बठिंडा के पश्चिम की ओर, अर्थात सतलुज के किनारे पर थी. किस काल में वे इस स्थान से गए वे नहीं जानते; लेकिन यदि, जैसा कि बहुत संभव लगता है, मगियास (Magiaus) जिनका यमुना और गंगा के किनारे तैमूर (Timur) से सामना हुआ वे मघ ही थे, सतलुज के किनारों से उनका जाना तुलनात्मक रूप से उससे पूर्व ही हुआ होगा. चिनाब के मेघों की परंपरा के अनुसार उन्हें पहले पहल आए मुहम्मदनों (Muhammadans) ने मैदानी इलाकों से खदेड़ा था, एक ऐसा बयान जिसका संदर्भ हम ग्यारहवीं शताब्दी के शुरू में महमूद के अतिक्रमण से या उसके क़रीबी उत्तराधिकारियों के लाहौर पर अंतिम कब्ज़े से ले सकते हैं.
(मूल पाठ में कन्निंघम ने निम्नलिखित से संदर्भ दिए हैं)
* Orljis DcsLTi1itio, V. 1145.
• Smith's Rcv1ning Family of Lahor, p. 232, and Appendix p. xxix. In the text he m.'iti* the " Tukkers" Hindus, but in the Appendix he calls the " Tuk" a " brahman caste." The two names are, however, most probably not the same. t Ibid, pp. 232, 201, and Appendix p. Xxix."



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Glossary of Tribes : A.S.ROSE