Marwar is Remained Ancient Land of Meghs.Tara Ram Gautam

Wednesday, April 19, 2017

MARWAR IS ANCIENT LAND OF MEGS :
IT WAS A POLITICAL UNIT OF SINDH TOO
AND IN ANCIENT TIME  UNDER PERSIAN EMPIRE.
NOMENCLATURE WAS DRIVED FROM MEG, IT IS STATED IN ASI REPORTS TOO.

मारवाड़ शब्द पर कुछ टिप्पणियां
Scattered comments on Marwar ..
प्राचीन काल में कई भौगोलिक क्षेत्रों के नाम वहां निवास करने वाले जातीय समूहों या लोगों के नाम से प्रचलित हुए, इसमें वर्त्तमान राजस्थान के कई भू भाग है, जो वहां निवास करने वाले लोगों के नाम से जाने जाते है। इनमे  "मारवाड़" नाम से विख्यात भू भाग भी एक है।
        " मारवाड़ " का नाम यहाँ निवास करने वाले म्हार लोगों के कारण ही पड़ा। म्हारों के कारण म्हार वाड, मारवाड़ आदि नाम प्रचलन में आया। यहाँ राजपूतों के आधिपत्य से पूर्व यह भू भाग म्हारों का निवास स्थान था और नाग जातीय लोगों से निवासित था। मल्ल, मालव, म्हार, मेघ एक ही जातीय समूह से माने गए है।
        म्हार,  मेर, मेव, मल्ल,   आदि जन समूहों से मारवाड़, मेर वाड, मेवाड़/मेवात, मल्लानी आदि राजस्थान के प्राचीन भू खण्डों के नाम है।
      मराठी साहित्य में इस बारे में बहुत कुछ है। विट्ठल राम जी शिंदे की पुस्तक में भी है। महार अपनी उत्पति सोमवंश से भी जोड़ते है।
           म्हार शब्द ही मा'र : मार हुआ।

     विगत कुछ शताब्दियों से मारवाड़ का अर्थ country of death कह कर प्रचलित किया गया, जो पूर्णतः गलत है। कुछ लोगों ने मरू भूमि और मरुस्थल नाम भी दिए परन्तु म्हार शब्द इतना दृढ हो गया कि कुछ भी नया नाम देने पर भी लोग इसे मारवाड़ ही पुकारते है।
            अगर मार और वाड शब्द से उत्पति माने तो भी " संस्कृत " में " मार "  शब्द नहीं मिलता है। "मार" शब्द पालि का तकनिकी शब्द है। जिसका निश्चित अर्थ पालि में है। इसप्रकार से यह भू भाग प्राचीन कल में बौद्ध धर्म की शरण स्थली रहा है, यह प्रमाणित होता है। राजपूतों की सत्ता हो जाने के बाद भी वे मारवाड़ शब्द से पीछा नहीं छुड़ा सके।
          और भी कई तथ्य है। यहाँ   R G Latham की पुस्तक की मारवाड़ शब्द पर की गयी टिप्पणी दी जा रही है-
"Marwar: From-----like all countries--------. It is Marwar, marusthan, or marudesh- not the country of death ( as has been argued ), but the country of mhars(mairs)" page- 386-387, Descriptive Ethnology, volume-2, edition-1859, London.

         "मारवाड़ शब्द मारूवार  का अपभ्रंष है। यथार्थ में इसका नाम मरुस्थल या मरुदेश है, जिसका अर्थ होता है मरे हुए लोगों का देश।-------- इतिहासवेत्ताओं ने  नासमझी से मा'र देश लिखा है।"
   उक्त पंक्ति "जोधपुर राज्य का इतिहास" पुस्तक की है। इसमे यह भी लिखा है कि मुसल्मानो ने  इसका गलत नाम "मार देश" लिखा है। 
    यह अंग्रेंजो के पहले भी मार वाड ही कहा जाता था। काठियावाड़ - मार वाड उस समय प्रशिद्ध भू भाग थे और ये नाम वहां रहने वाले लोगों के कारन ही पड़े। मोहिले, मेर, मेघ और भील आदि लोग ही यहाँ रहते थे। जिनसे प्राय नवोदित राजपूतों से संघर्ष हुए। कई पुरानी जातियों ने नए नाम अख्तियार कर लिए। कई प्रवासी हो हो गए। कइयों ने धर्म बदल लिया।
     परन्तु यह स्पष्ट है कि राजपूतों से पहले यहाँ बौद्ध धर्म ही लोक धर्म   था। जिसे ख़त्म करने के लिए ब्राह्मणवादी लोगों ने राजपूत नाम के सामाजिक और राजनितिक घटक को जन्म दिया। इसका संकेत कई जगह है। यहाँ मारवाड़ मर्दुम शुमारी-1891, से इसका संकेत दिया जा रहा है-
    "पंवार,चौहान, सोलंखी, अग्निवंशी है-------इन अग्नि वंशी राजपूतों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि इनको बौद्ध मत वालों के मारने के लिए वशिष्ठ वगेरह ऋषियों ने आबू पहाड़ के ऊपर होम करके अग्नि कुंद से पैदा किया था।"  पृष्ठ-3,
   और भी कई प्रमाण है जो इस भू भाग को बुद्ध से जोड़ता है। कुछ जातकों में तो बुद्ध को भी यहाँ विचरण करता हुआ वर्णित किया है।
              मारवाड़ तो बहुत छोटा भूभाग है, एसिया के रेगिस्तान का। ज्यादातर हिस्सा पाकिस्तान में। जैसलमेर भी रेगिस्तान पर उसे माड देश कहते थे। बीकानेर भी रेगिस्तान पर उसे जांगल   देश कहते। बाड़मेर रेगितन पर उसे मल्लानी कहते।  रेगिस्तान के एक विशेष क्षेत्र को ही मारवाड़ कहते है। जयपुर ढूंढाड कहलाता। ये सभी मरुभूमि , पर सबको मारवाड़ नहीं कहते। अजमेर को मेरवाडा आदि आदि।
  अंग्रेजो से पहले की लिखी जियोग्राफी, इतिहास, एथ्नोग्रफी और भाषा विज्ञानं को थोडा देख लीजिये। ज्ञान में वृद्धि ही होगी। सायन, पाणिनी और मारवाड़ में प्रचलित कातंत्र व्याकरण और कच्चायन व्याकरण भी देख लीजिय, फिर बात करते है। सिंध और गुजरात का पुराना इतिहास जरुर देखे क्योंकि प्राचीन कल में यह भू भाग राजनैतिक रूप से उनका भी भाग रहा है।
               आप प्राचीन इतिहास को कैसे नकारेंगे?
राजस्थान में सबसे प्राचीन जो शिला लेख मिले है। वह ब्राह्मी लिपि और पालि भाषा मे ही  क्यों है?
राजस्थान मुजियम अजमेर में रखे नगरी के लेख को देखे- उसमे मलव गण का स्पष्ट उलेख-" कृतेसु-----मलावपुर्व्वाया"
   कोटा के कणास्वा  में मिले लेख में"---- सप्त्भिर्म्मालवेशानाम"
जयपुर के पास मिले सिक्कों में मालवां,मालवानाम, मगय आदि लेख मिलते है। ये सब मल्ल किंवा मालव लोगों के अस्तित्व को ही सिद्ध करते है। जिनका राजपूतो से पहले यहाँ राज्य था।
    जोधपुर और अजमेर के पास मिले सबसे पुराने शिलालेख भी ब्रहमी लिपि और पालि में है तो ऐसे में उस समय के शब्दों का अर्थ भी पालि से ही ग्रहण करना पड़ेगा।

             This was land of Megs- it is historical proved. You can see details in my coming books on Meghavansh: History & Culture


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सिंधु घाटी की सभ्यता और मेघ समाज का इतिहास।

Monday, April 3, 2017

सिंधु घाटी ( मेघवंशीय ) सभ्यता मेघवंश का उद्भव मेघऋषि से माना जाता हैं. मेघ शासक सिंधु सभ्यता के पराकर्मी शासक रहे हैं . मेघऋषि के वंशजों को ही मेघ, मेघवाल कहा गया हैं .मेघवाल का असली शब्द मेघवार हैं .मेघवार की जगह प्राय: मेघवाल शब्द का प्रयोग किया जाता हैं . मेघवार शब्द संस्कृत के मेघ तथा वार शब्द के मेल से बना हैं . मेघ शब्द का अर्थ बादल अथवा वर्षा तथा वार का अर्थ प्रार्थना हैं . मेघवार का अर्थ उन लोगों से हैं , जो वर्षा के लिए प्रार्थना करते हैं .कलिंग के मेघवंशीय खारवेल राजाओं ने अपने नाम के साथ मेघवाहन शब्द लगाया हैं .मेघवाहन का शाब्दिक अर्थ मेघों ( बादलों ) का वाहन करने वालों से हैं . मेघ भारत के मूल किसान हैं . प्राचीन इतिहास का अवलोकन करने से ज्ञात होता हैं के विभिन प्राचीन सभ्यताओं में राजऋषि परम्परा प्रचलित थी . वह राजऋषि अपने देश का शासक होता था और धर्मगुरु भी . सुरसती , सतलुज ,व्यास ,रवि , चिनाब ,जेहलम और सिंधु आदि सात नदियों के दोआबों और उत्तर दक्षिण किनारों पर पनपी सिंधु घाटी सभ्यता में रजऋषियों की परम्पराएं थी. अंततः राजऋषि वृत्र ही सप्तसिंधु प्रदेश के दास (भक्त या भगत ) कहलाने वाली प्रजा के धर्मगुरु व राजा अर्थात राजऋषि थे . राबर्ट एडम का कथन है कि वहां प्राचीन राजपुरोहित शासकीय प्रणाली थी. .ऐसे राजऋषि राजाओं की आज्ञा मेघेश्वर की आज्ञा के समान मानी जाती थी . डॉ मैके और डॉ व्हीलर ने शोधों के आधार पर कहा हैं के मोहनजोदड़ों में भी सुमेरिया की तरह धार्मिक शासन पाया गया हैं . सम्पूर्ण सप्तसिंधु प्रदेश राजऋषि वृत्र के अधिकार में था . राजऋषि वृत्र के पास असंख्य फौज थी . वे जब चलती थी तो मेघों की तरह छा जाती थी , इसीलिए राजऋषि वृत्र ही महामेघ मेघऋषि थे . श्री नवल वियोगी की पुस्तक 'सिंधु घाटी के सृजनकर्ता -शुद्र और वणिक ' में जिस सिंधु घाटी क्षेत्र का वर्णन हैं , उसमे समूचा पश्चिमोत्तर अविभाजित भारत , जिसमे सम्पूर्ण पाकिस्तान , पंजाब, हरयाणा, हिमाचल प्रदेश , राजस्थान, गुजरात, और पश्चमी उत्तर प्रदेश का भूभाग आता हैं . यह क्षेत्र मिश्र के क्षेत्र से चार गुना , इराक और मिश्र दोनों के क्षेत्र से लगभग दोगुना था . यही क्षेत्र मेघऋषि का क्षेत्र था . इसी क्षेत्र में मेघ, मेघवाल, मेघवंशी , कोरी, कोली, कोष्टी, बलाई, साल्वी , सूत्रकार बुनकर , कबीर पंथी, जाटव, बैरवा, चंदौर, चमार, इत्यादि विभिन नामों से जाने वाली मेघऋषि की की जातियों का बाहुल्य रहा हैं . ऋग्वेदनुसार सप्त नदियों द्वारा संचित प्रदेश राजऋषि वृत्र के अधीन था . राजऋषि वृत्र को नाग कुल का संस्थापक भी माना गया हैं . नाग ( असुर ) मूलतया शिव उपासक बताये गए हैं . नागवंशियों को उनकी योग्यताएं , गुणवत्ता , व्यवहार व कार्यशैली के कारण देवों का दर्ज़ा दिया गया हैं . वे वास्तुकला आदि में निपुण थे . नागवंशियों का सम्पूर्ण भारत पर राज्य था . सिंधु सभ्यता में मिली मोहरों पर पशु व सांप के निशान पाए गए हैं . नागवंश के लिए सर्प की पूजा का प्रचलन था . ऋग्वेद से पूर्व जो भी लिखा गया था , वे सातों नदियों के मुहानों पर बने बांधों को तोड़ने से जलप्लावन में बह गया और सिंधु लिपि की सीलें पढ़ी नहीं जा रही हैं . अतः मेघवंश का इतिहास जानने के लिए ऋग्वेद पर ही आश्रित होना पड़ेगा . ऋग्वेदनुसार आर्यों ने जब भारत में प्रवेश किया तो सम्पूर्ण भारत पर वृत्रासुर मेघ का एक मात्र राज्य था . सिंधु सभ्यता कृषि प्रधान थी तथा उन्होंने नदियों पर पांच बांध बना कर वर्षा के पनि को रोक हुआ था ताकि केवल वर्षा पर निर्भर न रह कर समय पर फसलों की सिचाई कर सके . आर्यों के प्रधान सेनापति इंद्र की जब वृत्रासुर मेघ से भिड़ंत हुई , तो इंद्र उन्हें परास्त नहीं कर सका. उसने कूटनीति अपनाकर मेघों के शस्त्र विशेषज्ञ मूल भारतीय त्वष्टा को आपने साथ मिला . त्वष्टा ने आर्यों के प्रधान सेनापति इंद्र को परामर्श दिया के महामेघ वृत्र की हत्या तथा उनके मजबूत किलों को ध्वस्त करने के लिए वज्र तैयार करवाया जाये . इंद्र ने त्वष्टा पुत्र त्रिसरा को अपना पुजारी न्युक्त कर लिया , क्योकि वह वज्र बनना जनता था , इसलिए इंद्र ने उसे वज्र बनने की आज्ञा दी , लेकिन त्रिसरा ने अनहोनी के चलते विद्रोह खड़ा कर दिया. इंद्र ने क्रोधित होकर उसकी हत्या कर दी. अपने पुत्र की हत्या से भयभीत होकर त्वष्टा ने खुद वज्र का निर्माण किया . उस वज्र से इंद्र ने वृत्रमेघ द्वारा रचित पांचों बांधों को तोड़ दिया और प्रथम वृत्रमेघ का वध कर दिया ( ऋग्वेद ३२ वें सूक्त के सातवें श्लोक १ से ५ ). बचे हुए सिंधु वासियों मेघों को गुलाम बना लिया . ऋग्वेदनुसार मेघों में प्रथम मेघ वृतमेघ थे, मेघवंश अति प्राचीन मेघवंश हैं . शनै शनै विभिन्न नाम , प्रान्त एंव विचारधारा के चलते यह महान मेघवंश अलग अलग नामों में बंट गया. साभार " मेघवंश एक सिंहावलोकन ।


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हरवंश मेघ अबोहर पंजाब मेघवंश इतिहास

Thursday, December 29, 2016

🙏🏼जय मेघ          जय भीम🙏🏼
हरबंश मेघ पंजाब मेघवंश इतिहास
 
           ऋग्वेदनुसार समाज चार वर्णो में विभाजित था ,संभवतय इन्ही वर्णो से  विशेष संगठन, जाति के रूप में परिवर्तित हुए. १३७५ विक्रमी से १७०० विक्रमी हिंदी साहित्य का श्रेष्ठ काल माना गया   है ,कुछ रामनुआयियों ने सर्गुण भक्ति का समर्थन कर राम की उपासना पर बल दिया ,जातिविहीन समाज की कल्पना कर "जाति पाती पूछे नाही  कोय , हरि का भजै सो हरि का होय" पर बल दिया .
                                                              निर्गुण भक्ति के प्रवर्तक नानक, दादूदयाल, मलूकदास एंव प्रमुख रूप से कबीर साहेब ने अध्यात्मक रूप से समाज को चेतन कर जातीय दंश से मुक्त   करने की कोशिश की. लेकिन शनै: शनै:समाज में जातीय वयवस्था की जड़ें गहरी होती गई . ब्रिटिश शासन     काल में भारत में ११०८ जातियां सूचीबद की गईं.
                                                              भारत के संविधान  में बाबा साहिब डॉ भीम राव अम्बेडकर ने भारत के प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की सरंचना कर समाज में समानता का  संवैधानिक विकल्प खोजा.लेकिन समाज जातीय प्रथा से निज़ात नहीं पा सका.
                                                              अन्य बहुत सी जातियों की तरह समाज की अति सम्मानीय लेकिन पूर्णत:   अपना मूलस्वरूप   खो चुकी मेघ जाति की पहचान, मान-सम्मान एंव उत्थान के लिए लम्बे समय से प्रयास किये जा रहे हैं , पंजाब में कुछ उत्साही नौजवानों के सहयोग से " भगवान श्री मेघऋषि सेवा समिति " गठित कर अबोहर शहर के इर्द गिर्द गावों में मेघ समाज को जागृत करने की कोशिश की गईं . यह मिशन उस वक्त   के एक मात्र  उपलब्ध साहित्य " मेघवंश इतिहास " रचित स्वामी गोकुल दस  महाराज पर आधारित था
मेघवंश इतिहास की रचना स्वामी गोकुल दास जी रूपी मेघसपूत ने सम्भवत: १९६० ईस्वी में की . वैज्ञानिक एंव अध्यात्मक   दृष्टि   से रचित इस  दुर्लभ साहित्य   को बेशक   गंभीरता    से नहीं लिया .लेकिन व्यक्तिगतरूप       से मेरा मानना है के  विभिन्न   उपजातिओं एंव विभिन धारणाओं में बंटे अगर मेघवंश को संगठित   करना है तो "मेघवंश इतिहास" को आधार बनाना ही होगा,
                                                                           ' वैज्ञानिक सृष्टि वर्णन'       
आज से अरबों साल पहले हमारा यह सूर्य     धधकती हुई महा विशाल ज्वालाओं का महापुंज था और इस अनन्त       आकाश में महा वेग से चक्कर     लगता रहा फिर धीरे धीरे चारों तरफ से जैसे जैसे    ठंडा होने लगा जैसे जैसे  इसमें से टुकड़े होकर इस सूरज के चारों और घूमने लगे, यह टुकड़े इसके ग्रह कहलाते हैं इन्ही में से एक हमारी पृथ्वी है.
आरम्भ में जब पृथ्वी पर समुन्दर बने और उन समुंद्रों में वर्षा का पानी बह कर आने लगा तो उस पानी के साथ पृथ्वी से चिप्पट और पर्बत शिलाओं   का चूर्ण भी काट छिल कर आने लगा . इस कूड़ा कर्कट के निरंतर   मिलते रहने से समुन्दर का पानी खारी हो गिया और उसमे लोहा,चूना, गंधक आदि पदार्थ मिल गए जिससे समुन्दर जल में जीवन
   के सभी तत्व इकठ्ठे ही गए. इस प्रकार संभवतया जीवन का उदय हुआ.
                                                  "ऋषियों की उत्पत्ति और मेघवंश जाति का निकास "
ऋषियों की उत्पत्ति और उनकी वंशावली स्मृृतिओं और पुराणों में विस्तार से लिखी हुई है ,सृष्टि के आदि में श्री नारायण, नारायण   के नाभि कमल से ब्रह्मा, ब्रह्मा ने सृष्टि रचने की इच्छा से सनक, सनन्दन,सनातन, संतकुमार इन चारों ऋषियों   को उत्पन किया लेकिन यह चारों नैष्टिक   ब्रह्मचारी   रहे फिर ब्रह्मा ने दस  मानसी पुत्रों को उत्पन्न   किया.
                                                          मरीचि,अत्रि,अंगिरा,पुलस्त्य,पुलह,क्रतु,भृगु,वशिष्ट,दक्ष,नारद,| ब्रह्मा ने अपने शरीर   के दो खण्ड  कर के दाहिने भाग से स्वायम्भुव मनु ( पुरुष  ) और बाम भाग से स्तरूपा ( स्त्री ) को उत्पन किया करके मैथुनी सृष्टि आरम्भ की. स्वायम्भुव मनु स्तरूपा से २ पुत्र- उत्तानपाद और प्रियव्रत तथा आकुति,प्रसूति,देवहूती ये ३ कन्याएँ उत्पन हुई, उत्तानपाद के ध्रुव पैदा हुआ .
                                                           प्रियव्रत ने कर्दम की पुत्री  प्रजावती से १० लड़के आग्निरध,मेधातिथि,वपुष्मान, ज्योतिष्मान ,और धीउतिमान,भवय और सवन. इनके अतिरिक्त मेधा , अग्निबाहु,और मित्तर ये तीनो नैष्ठिक ब्रह्मचारी होकर बन में तपस्या  करने चले गए, सो  राजा प्रियव्रत  ने सातों द्वीपों का राज्य सातों पुत्रों को दे दिया.
ब्रह्मा जी के दूसरे पुत्र
अत्रि ऋषि ,अत्रि ऋषि अनुसूया के ब्रह्मा ,विष्णु,महेश के वचन से दत्तात्रेय,दुर्वासा, और चन्द्रमा ये तीन पुत्र हुए | अत्रि ऋषि के चन्द्रमा (सोम) इनसे चन्द्रवंश चला |चन्द्रमा के बृहस्पति ,बृहस्पति के बुध ,बुध के पुरुरवा ,पुरुरवा के आयु ,आयु के नोहास( नहुष ) इनके सात पुत्र यति ,ययाति,संयाति,उदभव,पचि,सर्याेति,और मेघजाति .
                                                                          ययाति के यदु ,इनसे यदुवंश चला.ब्रह्मा जी के पुत्र अंगिरा ऋषि श्रद्धा से चार कन्यायें सिनीवाली,कुहू,राका,अनुमिति और दो लड़के उतथ्य और बृहस्पति पैदा हुए. ब्रह्मा जी के पुत्र वशिष्ट ऋषि की अरुंधति, नामक स्त्री से मेघ, शक्ति आदि १०० पुत्र और ऊर्चा नामक स्त्री से ७ पुत्र चित्रकेतु,बिरजा,मित्र,उल्वण,वसु,भृध्यान,द्युमन,उत्पन्न हुए.ब्रह्मा जी के पुत्र मेघऋषि से मेघवंश चला.
                                                         शाश्त्र "पच मात्रा जंजीर "में गोरखनाथ जी ने कहा है " अलखपुरुष ले आरम थाया, आपका तन से मेघ उपाया". उन्होंने महादेव जी को मेघ बताया है, "बैठी देवी आरम थाई !अलख सामी सूरत लगाई!घर ऋषियां के जन्म धराई, जाग जाग अब मेघ सपूता, asankhya    असंख्य जुग परले बीता".
                                   पुराणों में ब्रह्मा जी पुत्र मेघऋषि का वर्णन आता है, सम्भवतया वह इन्ही के लिए आता है क्योंकि पुराणों में ही कहीं ब्रह्मा और विष्णु को शिवपुत्र बतलाये हैं तो कहीं शिव को ब्रह्मपुत्र बतलाया है तथा कहीं तीनों के एक ही पुरुष के तीन स्वरुप बतलाये  हैं जिसे निरंजन कहा गया है . स्वामी गोकुल दास जी द्वारा दिए उक्त तत्थों से मेघ एंव मेघवंश की परिभाषा को जानने में कुछ शेष नहीं रह जाता, उन्होंने स्पष्ट किया है कि मेघ एक आदिधर्म है और इस अतिपवित्र  'मेघधर्म' को मानने वाले ही मेघ,मेघवाल हैं,जो परिस्तिथिवश नाम,प्रान्त एंव विभिन विचारधाराओं में बंट गए. इस समाज का अनादि काल से मुख्य  पंथ 'अलखनामी' हैं,अर्थात वह सर्वव्यापक सत्ता जो इन आँखों से न  दिखाई देकर,केवल ज्ञान द्वारा जिसका अनुभव हो ,उस सत्ता को 'अलख' नाम से सम्बोधित किया है. उस सर्वोच्च सत्ता को निर्जन,निराकार,ज्योति स्वरूपी,अजर अमर अविनाशी,अनघड़,सत चित आनंद,सर्वत्र परिपूर्ण,आदि अनेक गुणवाचक शब्दों में वर्णित किया गया है.
                                            इस सर्वोच्च सत्ता की महिमा ब्रह्मा,विष्णु,महेश,नारद शारद,व्यास-वशिष्ट आदि तमाम देवी- देवता ऋषि मुनि संत-महात्मा,ज्ञानी-ध्यानी,योगी,यति,दादु,कबीर,नानक,रैदास,रणसी खिवण,रामदेव जी,गौरख मछंदर,भरथरी,आदि ने अपने-अपने अनुभव कि आधार पर अलख को परम आराध्य का लक्ष्य करके मुक्त कंठ से की है.
                                                स्वामी गोकुल दास जी की अद्धभुत वंशावली
हर इंसान अपने वंश कि बारे में दो चार पीढ़ीयों की जानकारी रखता है लेकिन स्वामी जी ने आदि से वर्तमान तक वंशावली का विवरण उपलब्ध करवा कर अपनी  दूरदृष्टिेता   का लोहा मनवाया है.उन्होंने अपनी वंशावली को इस तरह प्रस्तुत  किया है:
१ आदि नारायण २   ब्रह्मा ३  अत्रि ऋषि ४ समुन्दर ५ सोम(चन्द्रमा )इनसे चन्द्रवंश चला. ६ सालम ७ साथल ८ सोहड़ ९ हरदेव  १०बालसुर ११ सुकदेव १२ शाला १३ देवसी १४ शिवदान १५ भीमसाल १६ एडीसाल १७ सुरतान १८ देवगन १९ बिरमदेव २० बाघवीर २१ धारवा २२ मोगराव २३ लक्ष्मण भाटी क्षत्रियों से धार के पवार राजपूतों ( अग्नि वंश) से मिल गए. २४ बरसल २५ शम्बू २६ जसरुप २७ बलबीर २८ गुणपाज २९रघुनाथ ३० करमसी ३१ खींवसी ३२ जगमाल ३३ गालन ३४ किशनसी ३५ मांडण ३६ देवचंद (भागंद) ३७ मेहराम (मलसी) ये सूर्यवंशी राठौड़ चांदावत राजपूतों में मिल गए.और बलूंदा(मारवाड़ ) में जा बसे.  ३८ इसान ३९ गोपाल ४० देवराज ४१ भोपाल ४२ जगपाल ४३ आहड़ ४४ आबान ४५ आसी ४६ जेसो ४७ गाजी ४८ लालो(१) ४९ जोरजी के दो पुत्र मुकन जी  और मानसिंघ जी. जोरजी मेघवंशी चांदावत राठौड़ों के साथ गांव बलून्दा में संवत १६५२ में जूंझार हुए .जिनकी तलाब के पाल पर  देवली है.और उनके वंशज भुगानपुरा में जा बसे. मान  सिंह के ३ पुत्र थे भगवान,आसल एंव ऊदा .  भगवान के दो पुत्र हरी दास एंव जालम. हरी दास  के भारमल एंव शम्बूर. भारमल के उदैभान,मलसी. उदैभान जी स.१७७५ में डूमाड़ा में बसे और वहीं जूंझार हुए.जिनकी  खांडिया बेरा पर यादगार बानी हुई  है. मलसी जी के उर्जन चांपो,सैतान . उर्जन के बीरम,किरपो,सुन्डो. बीरम के मालो,गांगो. माला के जालप एंव करमो. जालप के मोटो ,नानक,केशो,कल्लो. मोटा के लालो (२)
लाला- आसा,अम्बा,गुमान.
आसा- जयराम,तारा.
तारा -दल्ला,जोधा,जेवा.
जोधा- सूजा,रामचन्दर,बुध,सोजी,सांवता.
सूजा- भियां,चमना,उद्दा,वेणा,उर्जा.
भियां -  किशना,रामा,बाघा.
रामा-    नंदराम भूरा.
                            बाघा- भोला.
                            भोला -लाला,तुलसीबाई.
                            लाला -घिस्सा,शांतिबाई .
नन्द राम - बालू,छित्तर,रुगा,गोकुल दास जी,लाडीबाई,गलकुबा                 
                                           
    
                                                                                   .
                                                                 (चन्द्रमा )इनसे चन्द्रवंश चला. ६ सालम ७ साथल ८ सोहड़ ९ हरदेव  १०बालसुर ११ सुकदेव १२ शाला १३ देवसी १४ शिवदान १५ भीमसाल १६ एडीसाल १७ सुरतान १८ देवगन १९ बिरमदेव २० बाघवीर २१ धारवा २२ मोगराव २३ लक्ष्मण भाटी क्षत्रियों से धार के पवार राजपूतों ( अग्नि वंश) से मिल गए. २४ बरसल २५ शम्बू २६ जसरुप २७ बलबीर २८ गुणपाज २९रघुनाथ ३० करमसी ३१ खींवसी ३२ जगमाल ३३ गालन ३४ किशनसी ३५ मांडण ३६ देवचंद (भागंद) ३७ मेहराम (मलसी) ये सूर्यवंशी राठौड़ चांदावत राजपूतों में मिल गए.और बलूंदा(मारवाड़ ) में जा बसे.  ३८ इसान ३९ गोपाल ४० देवराज ४१ भोपाल ४२ जगपाल ४३ आहड़ ४४ आबान ४५ आसी ४६ जेसो ४७ गाजी ४८ लालो(१) ४९ जोरजी के दो पुत्र मुकन जी  और मानसिंघ जी. जोरजी मेघवंशी चांदावत राठौड़ों के साथ गांव बलून्दा में संवत १६५२ में जूंझार हुए .जिनकी तलाब के पाल पर  देवली है.और उनके वंशज भुगानपुरा में जा बसे. मान  सिंह के ३ पुत्र थे भगवान,आसल एंव ऊदा .  भगवान के दो पुत्र हरी दास एंव जालम. हरी दास  के भारमल एंव शम्बूर. भारमल के उदैभान,मलसी. उदैभान जी स.१७७५ में डूमाड़ा में बसे और वहीं जूंझार हुए.जिनकी  खांडिया बेरा पर यादगार बानी हुई  है. मलसी जी के उर्जन चांपो,सैतान . उर्जन के बीरम,किरपो,सुन्डो. बीरम के मालो,गांगो. माला के जालप एंव करमो. जालप के मोटो ,नानक,केशो,कल्लो. मोटा के लालो (२)
लाला- आसा,अम्बा,गुमान.
आसा- जयराम,तारा.
तारा -दल्ला,जोधा,जेवा.
जोधा- सूजा,रामचन्दर,बुध,सोजी,सांवता.
सूजा- भियां,चमना,उद्दा,वेणा,उर्जा.
भियां -  किशना,रामा,बाघा.
रामा-    नंदराम भूरा.
                            बाघा- भोला.
                            भोला -लाला,तुलसीबाई.
                            लाला -घिस्सा,शांतिबाई .
नन्द राम - बालू,छित्तर,रुगा,गोकुल दास जी,लाडीबाई,गलकुबागलकुबाई.
भूरा - राजू,हज़ारी,नंगीबाई,मानीबाई.
रुघा - नारायण,परताब.
नरायण - भंवर लाल ,जगदीश,मोहनलाल.
गोकुलदास - सेवा दास (दत्तक पुत्र ) पूर्व विधायक
सेवा दास - चिरंजी  लाल, मिट्ठन लाल ,ओम प्रकाश,रमेश चन्दर,विजय,लक्ष्मीबाई.
                                                    अत्रि  ऋषि से सोम (चन्दर वंश) से सिंहमार मेघवंशी नख भाटी राजपूत, मरीचि ऋषि से सूर्यवंश नख राठोड राजपूत .
                                                   विश्वामित्र ऋषि से हुतासनी (अग्नि वंश ) नख पंवार राजपूत यह तीनों वंश सिंहमार (मेघवंशियों ) से चालू है .
                                                    चमना, सरुपा,रतन सिंहमार (मेघवंशी) नख राठौड़ डूमाड़ा. पांचों, बीरम,कानो,बभूत,भीको,कुन्नो,दुर्गो,अमरो,रामो,सिंहमार,(मेघवंशी) नख भाटी गांव कुड़ी (मारवाड़). तेजो,हरी,कजोड़,केसो,सिंहमार(मेघवंशी)नख चांदावत राठौड़ गांव बलुन्दा (मारवाड़) तथा भगानपुरा.
                                                     कुलदेवी दुगाय,छाबडे पूजा,बीसन नरच्या, पूजा बाजोट पाट,बीज दिन,इष्ट महादेव, परवार,हनुमान,ऋग्वेद ,गौत्र ,सोमवंशी ,स्यामलदल ,सामवेद,पचरंग निशान ,अबलक घोड़ो ,पल्लीवाल पुरोहित ,छटढाल,दत्तधाळ,थान मुल्तानपुर ,तिलक परपटन, थान लाहौर,कनौज,इंद्रगढ़,मंडावर,मेरता,धार,उज्जैन,बलुन्दा,कुड़ी,भुगानपुर,डूमाड़ा .


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Glossary of Tribes : A.S.ROSE